कुछ ख़ास नहीं हुआ पिछले दो दिन में
शामें ठीक वैसी ही थी जैसे थी दो दिन पहले
भूख लगी थी, मैं खाके लौट आया.…
मगर पेट नहीं भरा मेरा
मेरा पेट तो तब ही भरता था
जब तुम वो घर के काम निपटाके
मुझे पूछती थी "खाना खा लिया तुमने?"
मैंने पांच बार तुम्हारे ट्वीट देखे थे,
कि कोई ट्वीट शायद मेरे लिए छोड़ा हो
मैसेज बॉक्स में भी मैसेज आये काफ़ी दफ़े
तुम्हारी उम्मीद थी.…
मग़र तुम्हारा कोई मैसेज न था
तुम नाराज़ हो मुझसे ये मालूम हैं मुझे
मगर वजह नहीं मालूम … थोड़ा नादाँ हूँ, क्या करें?
मुझे मनाना नहीं आता…
बस कुछ अल्फ़ाज़ काग़ज़ पे उतारना आता हैं
इस उम्मीद में
कि मेरे नज़्म की गर्माहट से शायद
तुम्हारी मोम जैसी नाराज़गी पिघल जाए
- अल्फ़ाज़
शामें ठीक वैसी ही थी जैसे थी दो दिन पहले
भूख लगी थी, मैं खाके लौट आया.…
मगर पेट नहीं भरा मेरा
मेरा पेट तो तब ही भरता था
जब तुम वो घर के काम निपटाके
मुझे पूछती थी "खाना खा लिया तुमने?"
मैंने पांच बार तुम्हारे ट्वीट देखे थे,
कि कोई ट्वीट शायद मेरे लिए छोड़ा हो
मैसेज बॉक्स में भी मैसेज आये काफ़ी दफ़े
तुम्हारी उम्मीद थी.…
मग़र तुम्हारा कोई मैसेज न था
तुम नाराज़ हो मुझसे ये मालूम हैं मुझे
मगर वजह नहीं मालूम … थोड़ा नादाँ हूँ, क्या करें?
मुझे मनाना नहीं आता…
बस कुछ अल्फ़ाज़ काग़ज़ पे उतारना आता हैं
इस उम्मीद में
कि मेरे नज़्म की गर्माहट से शायद
तुम्हारी मोम जैसी नाराज़गी पिघल जाए
- अल्फ़ाज़
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