Monday, 4 August 2014

फ़ोन कॉल

कुछ रोज़ पहले की बात हैं
उस रात पौने तीन बजे
फ़ोन कॉल पे
मेरे किसी बात को सुनकर
तुम बहुत ज़ोर से हँस पड़ी थी
तुम्हारी आवाज़… किसी हवा के झौंके की तरह
मेरे रूह को उड़ा ले गयी थी
मैं जी उठा था,
जैसे सूरज की पहली किरण से
कई मुरझाया हुआ सूरजमुखी का फूल
मुस्कुराने लगता हैं

वो लम्हा बहुत क़ीमती था,
मुझे तुम्हारी आवाज़ से इश्क़ सा हो गया था
उस एक लम्हे में ....
बड़े सलीक़े से
मैंने उस क़ीमती लम्हे को क़ैद कर रक्खा हैं ज़हन में

आज कल दिन बहुत लम्बे होते हैं
शाम होने तक रूह मुरझा सी जाती हैं
तुम्हारे साथ अब रोज़ बातें नहीं कर पाता
ऐसे शामों में
मैं उस लम्हे को थोड़ा थोड़ा करके खर्च कर लेता हूँ
तुम्हारी मुस्कराहट भरी आवाज़ सुनके
मेरी रूह फिर इक दफ़े भी जी उठती हैं
मैं फिर इक दफ़े मुस्कुरा लेता हूँ
सच… बहुत क़ीमती हैं वो लम्हा

-अल्फ़ाज़ 

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