Saturday, 2 August 2014

महक

मुझे मालूम हैं तुम आई थी यहाँ
कुछ देर पहले.... ठीक साधे छह बजे
जब आसमान से सूरज ढल चुका था
और चाँद फ़लक पे धीरे धीरे चढ़ रहा था
मैंने जैसे ही कमरे का डरवाज़ा खोला
एक तन्हा सी हवा मुझको छूकर गुज़री
हवा की महक से मैं वाक़िफ था
ये ठीक वही महक थी.... जो रह जाती थी पीछे
उस कॉफ़ी टेबल पे... जब तुम उठके जाती थी...
ह्म्म्म... तुम्हारे जिस्म की महक

आखरी मुलाक़ात जब हुई थी.... उस कॉफ़ी शॉप में
तुम अपना मेहेकता हुआ रूमाल
पीछे भूल गयी थी
डेढ़ साल हो गए हैं उस बात को मगर
मैंने उस रूमाल को
महफूज़ रक्खा हैं आज भी किताबों के शेल्फ़ में
ठीक उस डायरी के नीचे
जिसमे मैं आज भी तुम्हारे लिए नज़्म लिखा करता हूँ
औरों की नज़रों से छिपकर....

वो जो हलकी हलकी सी महक रह गयी हैं
वो अक्सर तुम्हारा एहसास करा देती हैं...
तरीक़ा भी अजीब चुना हैं मैंने... तुम्हे याद करने का

मगर ये दिल मेरा... ये किस्सा कुछ और ही सुनाता हैं
ये मुझसे कहता हैं अक्सर
कि वो महक तुम्हारे रुमाल की नहीं हैं
कि तुम रोज़ चली आती हो मेरे कमरे में
उन नज्मों को पढने के लिए,
उस रुमाल को चुराने का बहाना बनाकर,
मुम्किन होता अगर... तो लौटा देता मैं वो रूमाल
मगर लौटाऊ भी तो किसे?
तुम्हारा जिस्म अब नहीं रहा,
बस वो महक बची रह गयी हैं
-अल्फ़ाज़ 

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