Monday, 16 June 2014

ख्वाब

कुछ ख़्वाब ही तो है
आधे अधूरे
बस हक़ीक़त से
गुफ़्तगू बाक़ी है
(ये @drinsomniac द्वारा लिखा हुआ हैं)

निश्चिन्त

नजरें उस बच्चे पर
अनायास गयी 
जो एक मासूम सी
मुस्कान के साथ
माँ के गोद में
दुनियादारी से परे
अपने कुर्ते के बटन
से खेल रहा था

(ये बलिया वाले बाबा द्वारा लिखा हुआ हैं)

Thursday, 12 June 2014

पहली बारिश

पहली बारिश थी…पहली फुहार,
कॉलेज से आते वक़्त,
किसी बिल्ली की तरह भीग सा गया था,
बाल बिखरे हुए थे, और शर्ट की तो हालत ही मत पूछो,
अपने हाल को अनदेखा कर,
कॉलेज के बैग से एक पन्ना निकाला,
एक कागज़ की कश्ती बनाने के लिए

जब तक मोड़ता उस कागज़ को,
जब तक वो कश्ती बनती,
तब तक बारिश थम गयी थी,
बादल दौड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे,
मानो कह रहे हो
"अलविदा, और भी जगह जाना हैं फिर मिलेंगे"
मायूसी भरी आँखों से मैंने बादल से कहा
"रुक जाओ जनाब दो मिनट,
थोडा बचपन को जी लेने दो,
ऐसे मौक़े रोज़ रोज़ कहाँ मिलते हैं?"
मेरे गुजारिश को अनसुना कर,
वो आगे बढ़ गया,
मैं था वहाँ खड़ा भीगा हुआ सा…
हाथ में लिए एक कागज़ की अधूरी सी सूखी कश्ती

-बारिश के पानी में भीगने को बेताब कोई अल्फ़ाज़

गरीब (Pauper)

शेहेर बड़ा था, चौराहा बड़ा था,
ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती लाल थी,
वहाँ मोटरसाइकिल पे बैठा था मैं,
बगल में एक बड़ी गाडी थी जिसमें एक बड़ा सेठ बैठा था
नन्हे आँखों में उम्मीदें लीए… और नन्हे कदम बढाए,
एक "छुटकू" उस बड़ी गाडी की ओर बढ़ा,
अपने नन्हे नन्हे हाथ से उस बड़े गाडी के शीशे को,
वो नन्हा मासूम ३ बार खटखटाया

"क्या हैं?" पुछा वो बड़ा सेठ खिड़की खोल,
"साहब, बेघर हूँ, भूखा हूँ, अनाथ हूँ,
कल शाम से कुछ नहीं खाया,
५ रुपये ही दे दो,
एक वडा पाउ खा लूँगा"
बोला वो नन्हा मासूम,
"पैसे नहीं हैं, आगे बढ़" कहके उस बड़े सेठ ने खिड़की बंद कर दी
थोडा हैरान सा था, थोडा परेशान सा था,
भूख से जलते उस नन्हे मासूम का चेहरा देख,
कसम से जल गयी थी आँखें मेरी,
मायूसी लीए और अपना जलता पेट लीए,
वो मासूम अगले गाडी की ओर बढ़ गया

अपनी परेशानी भरी नजरो से,
मैंने उस बड़े गाडी में बैठे उस बड़े सेठ को देखा,
आज एक तलाश पूरी हुई थी,
उस शेहेर का सबसे बड़ा गरीब ढूंढ लिया था मैंने,
उस बड़े सेठ की आँखों में

- गरीबी के तौर तरीकों से हैरान कोई अल्फ़ाज़

Tuesday, 10 June 2014

दहशतगर्द (Terrorist)

ज़ात अलग हैं,
मज़हब अलग हैं,
लेकिन खुदा एक ही हैं,
बस इबादत का तरीका अलग हैं

नाम अलग हैं,
पहचान अलग हैं,
लेकिन खुदा एक ही हैं,
बस उसे देखने का नजरिया अलग हैं

आज ख़बर मिली,
चौराहे पे किसी दहशतगर्द ने,
किसी १२ साल के बच्चे को मार दिया,
वो चीखा था,
"भगवान के नाम पे छोड़ दो मुझे"

शायद गोलियों की आड़ में,
उसकी चीख दब गयी होगी,
वरना अगर ध्यान से सुनता
वो गोली चलाने वाला,
तो उसके खुदा का नाम,
और उस बच्चे के खुदा का नाम,
उसे एक सा ही पाक (पवित्र) लगता

- मज़हब की आड़ में घुट रहा कोई अल्फ़ाज़

Monday, 9 June 2014

अड्डा

उस बड़े से मॉल का नाम क्या हैं?
वही जो उस लम्बी सी सड़क के
दाइने ओर खडा हैं,
खैर जो भी नाम हो,
उस मॉल के पास,
वो फूंकने का अड्डा,
वो पान का "गल्ला",
याद हैं?
जहाँ खड़े खड़े,
गोल्ड फ्लैक लाइट,
और अल्ट्रा माइल्ड,
के धुएँ की आड़ में
छोटी बड़ी बातों पर,
गुफ्तगू करते थे,
याद आई वो जगह?
याद आई वो बातें?

आज उसी मॉल के बगल से,
गुज़र रहा था,
तो दो मिनट के लिए,
रुक गया उस अड्डे पर,
वही पुरानी सिगरेट,
अल्ट्रा माइल्ड माँगी,
वही पुराने लाइटर से,
उस सिगरेट को जलाया मैंने,
और पीछे मुड़ा
तो खुद से रूबरू हुआ,
उस छोटे से बेंच पर बैठा था,
तुम दोनों के साथ,
कोई बात चल रही थी,
ठीक से सुन नहीं पाया,
खैर वो बात जो भी रही हो,
ख़ुशी इस बात की थी,
कि खुदसे मुलाक़ात हुई थी,
यूँ रोज़ रोज़ थोड़ी ना,
यादें आ जाती हैं बाहे पसार,
किसीसे मिलने?

- हाथ वाला ठाकुर  और छह छह गोली वाले बाबा के साथ, पहले ट्वीट-अप को याद करता कोई अल्फ़ाज़

Friday, 6 June 2014

अल्फ़ाज़

Words,
I kiss them,
I bite them,
I love them,
I live them,
till the night permits,
till love permits

Fill them up,
in a goddamn syringe,
inject them,
into my veins,
one word at a time,
one feeling at a time,
till words satiate,
till feelings satiate

-बेचैनियों को बयाँ करता कोई "अल्फ़ाज़"