Thursday, 12 June 2014

गरीब (Pauper)

शेहेर बड़ा था, चौराहा बड़ा था,
ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती लाल थी,
वहाँ मोटरसाइकिल पे बैठा था मैं,
बगल में एक बड़ी गाडी थी जिसमें एक बड़ा सेठ बैठा था
नन्हे आँखों में उम्मीदें लीए… और नन्हे कदम बढाए,
एक "छुटकू" उस बड़ी गाडी की ओर बढ़ा,
अपने नन्हे नन्हे हाथ से उस बड़े गाडी के शीशे को,
वो नन्हा मासूम ३ बार खटखटाया

"क्या हैं?" पुछा वो बड़ा सेठ खिड़की खोल,
"साहब, बेघर हूँ, भूखा हूँ, अनाथ हूँ,
कल शाम से कुछ नहीं खाया,
५ रुपये ही दे दो,
एक वडा पाउ खा लूँगा"
बोला वो नन्हा मासूम,
"पैसे नहीं हैं, आगे बढ़" कहके उस बड़े सेठ ने खिड़की बंद कर दी
थोडा हैरान सा था, थोडा परेशान सा था,
भूख से जलते उस नन्हे मासूम का चेहरा देख,
कसम से जल गयी थी आँखें मेरी,
मायूसी लीए और अपना जलता पेट लीए,
वो मासूम अगले गाडी की ओर बढ़ गया

अपनी परेशानी भरी नजरो से,
मैंने उस बड़े गाडी में बैठे उस बड़े सेठ को देखा,
आज एक तलाश पूरी हुई थी,
उस शेहेर का सबसे बड़ा गरीब ढूंढ लिया था मैंने,
उस बड़े सेठ की आँखों में

- गरीबी के तौर तरीकों से हैरान कोई अल्फ़ाज़

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