ज़ात अलग हैं,
मज़हब अलग हैं,
लेकिन खुदा एक ही हैं,
बस इबादत का तरीका अलग हैं
नाम अलग हैं,
पहचान अलग हैं,
लेकिन खुदा एक ही हैं,
बस उसे देखने का नजरिया अलग हैं
आज ख़बर मिली,
चौराहे पे किसी दहशतगर्द ने,
किसी १२ साल के बच्चे को मार दिया,
वो चीखा था,
"भगवान के नाम पे छोड़ दो मुझे"
शायद गोलियों की आड़ में,
उसकी चीख दब गयी होगी,
वरना अगर ध्यान से सुनता
वो गोली चलाने वाला,
तो उसके खुदा का नाम,
और उस बच्चे के खुदा का नाम,
उसे एक सा ही पाक (पवित्र) लगता
- मज़हब की आड़ में घुट रहा कोई अल्फ़ाज़
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