पहली बारिश थी…पहली फुहार,
कॉलेज से आते वक़्त,
किसी बिल्ली की तरह भीग सा गया था,
बाल बिखरे हुए थे, और शर्ट की तो हालत ही मत पूछो,
अपने हाल को अनदेखा कर,
कॉलेज के बैग से एक पन्ना निकाला,
एक कागज़ की कश्ती बनाने के लिए
जब तक मोड़ता उस कागज़ को,
जब तक वो कश्ती बनती,
तब तक बारिश थम गयी थी,
बादल दौड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे,
मानो कह रहे हो
"अलविदा, और भी जगह जाना हैं फिर मिलेंगे"
मायूसी भरी आँखों से मैंने बादल से कहा
"रुक जाओ जनाब दो मिनट,
थोडा बचपन को जी लेने दो,
ऐसे मौक़े रोज़ रोज़ कहाँ मिलते हैं?"
मेरे गुजारिश को अनसुना कर,
वो आगे बढ़ गया,
मैं था वहाँ खड़ा भीगा हुआ सा…
हाथ में लिए एक कागज़ की अधूरी सी सूखी कश्ती
-बारिश के पानी में भीगने को बेताब कोई अल्फ़ाज़
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