Tuesday, 5 August 2014

कमरा

ये कमरा बड़ा हैं... पिछले वाले से काफ़ी बड़ा
पंखा घुमते हुए थोड़ा आवाज़ करती हैं
जो कमरे की ख़ामोशी में गूंजती हैं
तुम जब भी सपनों में आओ
दबे पाओं आना.... वरना तुम्हारी आहटों से मैं नींद से जाग जाऊंगा

आज बारिश हुई थी शाम को
खिड़की का काच थोड़ा टूटा हुआ था
बारिश की छीटें अंदर आ गयी
मेज़ पे कुछ कागज़ें  रक्खा था मैंने … वो भीग गयी
जो सियाही थी कागज़ पर वो फ़ैल गयी
और अल्फ़ाज़ कुछ धुंधले से हो गए
तीन साल परिवार से दूर रहकर
कुछ रिश्तों की सियाही फ़ैल सी गयी हैं
ज़िन्दगी के कागज़ पर
हैंड बैग में कपड़ों को भरा हैं
जिसमे से दो टी-शर्ट तुमने दिया था मुझे
मैंने उन दो टी-शर्ट को
तुम्हारी कुछ यादों के साथ समेट लिया उस बैग में

बहार कॉरीडोर पे तीन कुत्ते टहल रहे थे
आँखों से भूखे मालूम पड़े
मैंने हैंड बैग के अंदर तलाशा तो तुम्हारे यादों के बीच
मुझको एक बिस्कुट का पैकेट मिला
मैंने वो बिस्कुट कुत्तों को खिला दिया
उनकी आँखों में दोस्ती के जज़्बात नज़र आये
अब इस मोहोल्ले में मैं अजनबी नहीं रहा

एक और मोहल्ला अब धीरे धीरे जानने लगा हैं मुझको
एक और कमरा मैंने बदल लिया … एक "घर" की तलाश में

-अल्फ़ाज़

Monday, 4 August 2014

फ़ोन कॉल

कुछ रोज़ पहले की बात हैं
उस रात पौने तीन बजे
फ़ोन कॉल पे
मेरे किसी बात को सुनकर
तुम बहुत ज़ोर से हँस पड़ी थी
तुम्हारी आवाज़… किसी हवा के झौंके की तरह
मेरे रूह को उड़ा ले गयी थी
मैं जी उठा था,
जैसे सूरज की पहली किरण से
कई मुरझाया हुआ सूरजमुखी का फूल
मुस्कुराने लगता हैं

वो लम्हा बहुत क़ीमती था,
मुझे तुम्हारी आवाज़ से इश्क़ सा हो गया था
उस एक लम्हे में ....
बड़े सलीक़े से
मैंने उस क़ीमती लम्हे को क़ैद कर रक्खा हैं ज़हन में

आज कल दिन बहुत लम्बे होते हैं
शाम होने तक रूह मुरझा सी जाती हैं
तुम्हारे साथ अब रोज़ बातें नहीं कर पाता
ऐसे शामों में
मैं उस लम्हे को थोड़ा थोड़ा करके खर्च कर लेता हूँ
तुम्हारी मुस्कराहट भरी आवाज़ सुनके
मेरी रूह फिर इक दफ़े भी जी उठती हैं
मैं फिर इक दफ़े मुस्कुरा लेता हूँ
सच… बहुत क़ीमती हैं वो लम्हा

-अल्फ़ाज़ 

Saturday, 2 August 2014

महक

मुझे मालूम हैं तुम आई थी यहाँ
कुछ देर पहले.... ठीक साधे छह बजे
जब आसमान से सूरज ढल चुका था
और चाँद फ़लक पे धीरे धीरे चढ़ रहा था
मैंने जैसे ही कमरे का डरवाज़ा खोला
एक तन्हा सी हवा मुझको छूकर गुज़री
हवा की महक से मैं वाक़िफ था
ये ठीक वही महक थी.... जो रह जाती थी पीछे
उस कॉफ़ी टेबल पे... जब तुम उठके जाती थी...
ह्म्म्म... तुम्हारे जिस्म की महक

आखरी मुलाक़ात जब हुई थी.... उस कॉफ़ी शॉप में
तुम अपना मेहेकता हुआ रूमाल
पीछे भूल गयी थी
डेढ़ साल हो गए हैं उस बात को मगर
मैंने उस रूमाल को
महफूज़ रक्खा हैं आज भी किताबों के शेल्फ़ में
ठीक उस डायरी के नीचे
जिसमे मैं आज भी तुम्हारे लिए नज़्म लिखा करता हूँ
औरों की नज़रों से छिपकर....

वो जो हलकी हलकी सी महक रह गयी हैं
वो अक्सर तुम्हारा एहसास करा देती हैं...
तरीक़ा भी अजीब चुना हैं मैंने... तुम्हे याद करने का

मगर ये दिल मेरा... ये किस्सा कुछ और ही सुनाता हैं
ये मुझसे कहता हैं अक्सर
कि वो महक तुम्हारे रुमाल की नहीं हैं
कि तुम रोज़ चली आती हो मेरे कमरे में
उन नज्मों को पढने के लिए,
उस रुमाल को चुराने का बहाना बनाकर,
मुम्किन होता अगर... तो लौटा देता मैं वो रूमाल
मगर लौटाऊ भी तो किसे?
तुम्हारा जिस्म अब नहीं रहा,
बस वो महक बची रह गयी हैं
-अल्फ़ाज़ 

Friday, 1 August 2014

नाराज़गी

कुछ ख़ास नहीं हुआ पिछले दो दिन में
शामें ठीक वैसी ही थी जैसे थी दो दिन पहले
भूख लगी थी, मैं खाके लौट आया.…
मगर पेट नहीं भरा मेरा
मेरा पेट तो तब ही भरता था
जब तुम वो घर के काम निपटाके
मुझे पूछती थी "खाना खा लिया तुमने?"

मैंने पांच बार तुम्हारे ट्वीट देखे थे,
कि कोई ट्वीट शायद मेरे लिए छोड़ा हो
मैसेज बॉक्स में भी मैसेज आये काफ़ी दफ़े
तुम्हारी उम्मीद थी.…
मग़र तुम्हारा कोई मैसेज न था

तुम नाराज़ हो मुझसे ये मालूम हैं मुझे
मगर वजह नहीं मालूम … थोड़ा नादाँ हूँ, क्या करें?
मुझे मनाना नहीं आता…
बस कुछ अल्फ़ाज़ काग़ज़ पे उतारना आता हैं
इस उम्मीद में
कि मेरे नज़्म की गर्माहट से शायद
तुम्हारी मोम जैसी नाराज़गी पिघल जाए

- अल्फ़ाज़   

रंगीन सा छाता

इक रंगीन सा छाता हुआ करता था,
जिसे लेके चौथी कक्षा में मैं स्कूल जाया करता था,
बारिश के बेरंग से आसमान में...
कैसे ग़ुरूर से अपने रंग मिलाया करता था,
ना जाने दौड़ते दौड़ते इतने आगे आ गया हूँ,
कि पीछे मुड़के देखता हूँ
तो वो छाता कहीं नज़र नहीं आता,
वक़्त बहुत बीत गया हैं उससे बिछड़े हुए,
मगर अब भी जब यादों के शेहेर में बारिश होती हैं,
बहुत रंगीन होती हैं

इस बार बारिशें आएंगी जब,
तो मैं गुज़ारिश करूंगा,
कि अपने साथ वो छाता ले आये,
यूँ बेरंग सी बारिशें अब सुकूँ नहीं देती

- अल्फ़ाज़ 

Monday, 16 June 2014

ख्वाब

कुछ ख़्वाब ही तो है
आधे अधूरे
बस हक़ीक़त से
गुफ़्तगू बाक़ी है
(ये @drinsomniac द्वारा लिखा हुआ हैं)

निश्चिन्त

नजरें उस बच्चे पर
अनायास गयी 
जो एक मासूम सी
मुस्कान के साथ
माँ के गोद में
दुनियादारी से परे
अपने कुर्ते के बटन
से खेल रहा था

(ये बलिया वाले बाबा द्वारा लिखा हुआ हैं)

Thursday, 12 June 2014

पहली बारिश

पहली बारिश थी…पहली फुहार,
कॉलेज से आते वक़्त,
किसी बिल्ली की तरह भीग सा गया था,
बाल बिखरे हुए थे, और शर्ट की तो हालत ही मत पूछो,
अपने हाल को अनदेखा कर,
कॉलेज के बैग से एक पन्ना निकाला,
एक कागज़ की कश्ती बनाने के लिए

जब तक मोड़ता उस कागज़ को,
जब तक वो कश्ती बनती,
तब तक बारिश थम गयी थी,
बादल दौड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे,
मानो कह रहे हो
"अलविदा, और भी जगह जाना हैं फिर मिलेंगे"
मायूसी भरी आँखों से मैंने बादल से कहा
"रुक जाओ जनाब दो मिनट,
थोडा बचपन को जी लेने दो,
ऐसे मौक़े रोज़ रोज़ कहाँ मिलते हैं?"
मेरे गुजारिश को अनसुना कर,
वो आगे बढ़ गया,
मैं था वहाँ खड़ा भीगा हुआ सा…
हाथ में लिए एक कागज़ की अधूरी सी सूखी कश्ती

-बारिश के पानी में भीगने को बेताब कोई अल्फ़ाज़

गरीब (Pauper)

शेहेर बड़ा था, चौराहा बड़ा था,
ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती लाल थी,
वहाँ मोटरसाइकिल पे बैठा था मैं,
बगल में एक बड़ी गाडी थी जिसमें एक बड़ा सेठ बैठा था
नन्हे आँखों में उम्मीदें लीए… और नन्हे कदम बढाए,
एक "छुटकू" उस बड़ी गाडी की ओर बढ़ा,
अपने नन्हे नन्हे हाथ से उस बड़े गाडी के शीशे को,
वो नन्हा मासूम ३ बार खटखटाया

"क्या हैं?" पुछा वो बड़ा सेठ खिड़की खोल,
"साहब, बेघर हूँ, भूखा हूँ, अनाथ हूँ,
कल शाम से कुछ नहीं खाया,
५ रुपये ही दे दो,
एक वडा पाउ खा लूँगा"
बोला वो नन्हा मासूम,
"पैसे नहीं हैं, आगे बढ़" कहके उस बड़े सेठ ने खिड़की बंद कर दी
थोडा हैरान सा था, थोडा परेशान सा था,
भूख से जलते उस नन्हे मासूम का चेहरा देख,
कसम से जल गयी थी आँखें मेरी,
मायूसी लीए और अपना जलता पेट लीए,
वो मासूम अगले गाडी की ओर बढ़ गया

अपनी परेशानी भरी नजरो से,
मैंने उस बड़े गाडी में बैठे उस बड़े सेठ को देखा,
आज एक तलाश पूरी हुई थी,
उस शेहेर का सबसे बड़ा गरीब ढूंढ लिया था मैंने,
उस बड़े सेठ की आँखों में

- गरीबी के तौर तरीकों से हैरान कोई अल्फ़ाज़

Tuesday, 10 June 2014

दहशतगर्द (Terrorist)

ज़ात अलग हैं,
मज़हब अलग हैं,
लेकिन खुदा एक ही हैं,
बस इबादत का तरीका अलग हैं

नाम अलग हैं,
पहचान अलग हैं,
लेकिन खुदा एक ही हैं,
बस उसे देखने का नजरिया अलग हैं

आज ख़बर मिली,
चौराहे पे किसी दहशतगर्द ने,
किसी १२ साल के बच्चे को मार दिया,
वो चीखा था,
"भगवान के नाम पे छोड़ दो मुझे"

शायद गोलियों की आड़ में,
उसकी चीख दब गयी होगी,
वरना अगर ध्यान से सुनता
वो गोली चलाने वाला,
तो उसके खुदा का नाम,
और उस बच्चे के खुदा का नाम,
उसे एक सा ही पाक (पवित्र) लगता

- मज़हब की आड़ में घुट रहा कोई अल्फ़ाज़

Monday, 9 June 2014

अड्डा

उस बड़े से मॉल का नाम क्या हैं?
वही जो उस लम्बी सी सड़क के
दाइने ओर खडा हैं,
खैर जो भी नाम हो,
उस मॉल के पास,
वो फूंकने का अड्डा,
वो पान का "गल्ला",
याद हैं?
जहाँ खड़े खड़े,
गोल्ड फ्लैक लाइट,
और अल्ट्रा माइल्ड,
के धुएँ की आड़ में
छोटी बड़ी बातों पर,
गुफ्तगू करते थे,
याद आई वो जगह?
याद आई वो बातें?

आज उसी मॉल के बगल से,
गुज़र रहा था,
तो दो मिनट के लिए,
रुक गया उस अड्डे पर,
वही पुरानी सिगरेट,
अल्ट्रा माइल्ड माँगी,
वही पुराने लाइटर से,
उस सिगरेट को जलाया मैंने,
और पीछे मुड़ा
तो खुद से रूबरू हुआ,
उस छोटे से बेंच पर बैठा था,
तुम दोनों के साथ,
कोई बात चल रही थी,
ठीक से सुन नहीं पाया,
खैर वो बात जो भी रही हो,
ख़ुशी इस बात की थी,
कि खुदसे मुलाक़ात हुई थी,
यूँ रोज़ रोज़ थोड़ी ना,
यादें आ जाती हैं बाहे पसार,
किसीसे मिलने?

- हाथ वाला ठाकुर  और छह छह गोली वाले बाबा के साथ, पहले ट्वीट-अप को याद करता कोई अल्फ़ाज़

Friday, 6 June 2014

अल्फ़ाज़

Words,
I kiss them,
I bite them,
I love them,
I live them,
till the night permits,
till love permits

Fill them up,
in a goddamn syringe,
inject them,
into my veins,
one word at a time,
one feeling at a time,
till words satiate,
till feelings satiate

-बेचैनियों को बयाँ करता कोई "अल्फ़ाज़"